राजस्थान के धार्मिक स्थल pdf | Rajasthan ke Dharmik Sthal pdf Reet Mains Exam Special

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Rajasthan ke Pramukh Dharmik Sthal

राजस्थान में आगामी रीट मुख्य भर्ती परीक्षा (अध्यापक ग्रेड थर्ड) के पाठयक्रम में इस टॉपिक को राजस्थान के सामान्य ज्ञान वाले सेक्शन में जोड़ा गया है। जिससे यह कन्फर्म हो जाता है की इस टॉपिक से क्वेश्चन जरूर से पूछे जाएंगे।

राजस्थान में प्रमुख धार्मिक स्थलों की बात करें तो पता चलता की राजस्थान में लगभग 100 से अधिक धार्मिक स्थल है। राजस्थान के लगभग हर जिले में 2 – 3 से अधिक धार्मिक स्थल स्थित है, इन धार्मिक स्थलों में लोगों की अपनी मान्यता है व सभी लोगों की अपनी इनके साथ पूर्ण श्रद्धा है। आज की इस पोस्ट में हम राजस्थान के प्रमुख धार्मिक स्थलों के बारे में पढ़ेंगे। राजस्थान के धार्मिक स्थलों के बारे में हम जिलेवार अध्ययन करेंगे कि किस जिले में कौन सा धार्मिक स्थल है और क्या उसकी पौराणिक मान्यता है जिससे आपको जिलेवार यह सभी फैक्ट्स याद करने में बहुत ज्यादा आसानी होगी

राजस्थान में जिलेवार प्रमुख धार्मिक स्थल –

अलवर जिले के प्रमुख धार्मिक स्थल

पांडुपोल अलवर
  • यह भगवान हनुमान को समर्पित मंदिर है, जहाँ हनुमान जी की मूर्ति लेटी हुई अवस्था में है। 
  • सरिस्का अभ्यारण्य के गेट के माध्यम से इस मंदिर की ओर, एक पगडण्डी का रास्ता है। पौराणिक कथा के अनुसार, पांडव भाईयों ने अपने निर्वासन (अज्ञातवास) के समय, यहाँ शरण ली थी। 
  • पांडुपोल या पांडु द्वार पर भारी चट्टानों के बीच से एक झरना निकलता दिखाई पड़ता है। इस बारे में कहा जाता है कि भीम ने अपनी गदा से यहां मार्ग बनाया था।
  • पांडुपोल हनुमान मंदिर का मेला अलवर का एक लोकप्रिय मेला है जो हर साल भादौ शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भरता है।
  • अलवर दिल्ली मार्ग से लगभग 60 कि.मी. की दूरी पर यह जैन तीर्थ स्थल बना हुआ है। 
  • आठवें तीर्थंकर श्री चन्द्र प्रभा भगवान की स्मृति में यह प्राचीन मन्दिर बनवाया गया था। 
  • राजा महासेन और रानी सुलक्षणा के पुत्र ने अपने इस राज्य पर शासन करने के बाद, यहीं पर दीक्षा प्राप्त की थी। 
  • कई वर्षों तक मानव सेवा करने के बाद, उन्होंने एक माह तक ध्यान किया तथा निर्वाण प्राप्त किया। 
  • मंदिर में भगवान् श्री चंद्र प्रभु की धवल पाषाण की पद्मासन मुद्रा में मनोहारी मूर्ति विराजमान है।
  • यह अलवर से 40 कि.मी. की दूरी पर बना वह स्थल है जहाँ मांडव ऋषि ने तपस्या की थी। 
  • महाभारत काल के अनुसार, अर्जुन ने अज्ञातवास के दौरान, अपने हथियार तालवृक्ष स्थित एक विशाल वृक्ष के तने में छिपाए थे। 
  • सरिस्का वनक्षेत्र के नजदीक होने के कारण, यहाँ अरावली क्षेत्र की प्राकृतिक वनस्पति, ताड़ के लम्बे लम्बे पेड़ तथा जीव-जन्तु विचरण करते हैं। 
  • ताल वृक्ष मन्दिर परिसर में दो ठण्डे व गर्म पानी के कुण्ड बने हुए हैं, जहाँ तीर्थयात्री स्नान करते हैं। 
  • शाम के समय मंदिर की घंटियों की मधुर ध्वनि, पक्षियों का कलरव तथा बंदरों की उछल कूद, बरबस ही पर्यटकों को आकर्षित करती है।
  • अलवर से दक्षिण पश्चिम की ओर, 80 कि.मी. की दूरी पर नारायणी माता को समर्पित यह मंदिर अलवर जिले के राजगढ़ तहसील में बरवा डूंगरी की पहाड़ी की तलहटी ने स्थित है यह स्थानीय लोगों में बड़ी मान्यता रखता है। 
  • वैशाख शुक्ला एकादशी को यहाँ प्रतिवर्ष एक मेले का आयोजन किया जाता है।
  • यहाँ पर एक गर्म पानी का झरना भी है, जिसमें भक्तगण स्नान करते हैं।
  • नारायणी माता का यह मंदिर यह मंदिर सघन वृक्षों से घिरा हुआ है तथा यह सभी संप्रदायों एवं वर्गों का आराध्य स्थल है।
  • यह एक पुराना शिव मंदिर है तथा अलवर से दक्षिण की ओर, 24 कि.मी. की दूरी पर यह मंदिर चट्टानी पहाड़ियों से घिरा हुआ है। 
  • इन पहाड़ियों से बरसात के मौसम में प्राकृतिक झरनों से कलकल करता पानी, दो तालाबों में आता है। 
  • बेहद सुरम्य, शांतिपूर्ण और प्रकृति के सौन्दर्य से परिपूर्ण यह तीर्थस्थल, पर्यटकों तथा भक्तों के लिए स्वर्ग समान है।
  • अलवर के लोक देवता भर्तृहरी जी एक राजा थे। उनके जीवन के अन्तिम वर्ष यहीं बीते थे। 
  • महाराजा जयसिंह ने 1924 में भर्तृहरी जी के मंदिर को नया स्वरूप दिया। 
  • मंदिर में एक अखण्ड ज्योत सदैव प्रज्वलित रहती है। 
  • यहाँ मुख्य मेला भाद्रपद की अष्टमी को लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रृद्धालु बाबा भर्तृहरी की आराधना करने आते हैं। 
  • पास में ही, हनुमान मंदिर, शिव मंदिर और श्रीराम मंदिर भी स्थित है।
  • सरिस्का से, टहला गेट की ओर लगभग 30 कि.मी. की दूरी पर राजौरगढ में नीलकण्ठ मंदिर स्थित है। 
  • किसी समय यहाँ खजुराहो शैली एवं स्थापत्य से प्रभावित अनेक मंदिर थे। 
  • पहाड़ियों से घिरे, इस मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर का शिवलिंग है। यहाँ अखण्ड ज्योत जलती रहती है। 
  • मंदिर का शिखर भाग उत्तर भारतीय शैली का है और अधो भाग में चारों ओर देवी देवताओं, अप्सराओं, नायक नायिकाओं की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। 
  • ब्रह्मा, शिव, विष्णु, सूर्य गणेश, नृसिंह अवतार आदि की मूर्तियाँ, पौराणिक कथाओं को कलात्मक स्वरूप में अभिव्यक्त करती हैं। 
  • नीलकंठ मंदिर से कुछ दूरी पर जैन तीर्थंकर शान्तिनाथ जी की विशाल मूर्ति है, जिसे स्थानीय लोग ’नौ ग़ज़ा’ भी कहते है, क्योंकि यह 6 फुट ऊँची व 6 फुट चौड़ी है। 
  • प्रतिमा के सिर के पीछे एक प्रभामण्डल शोभायमान है। 
  • मंदिर के खण्डहरों में नृत्यांगनाओं, अप्सराओं, देवी देवताओं, हाथियों आदि की मूर्तियाँ और अवशेष दर्शनीय हैं। 
  • जैन और शैव मंदिरों का पास पास होना, मिली जुली संस्कृति का परिचायक है।
  • अलवर जिले में अलवर-दिल्ली मार्ग पर स्थित नौगांवा कस्बा समूचे उत्तरी भारत में दिगंबर जैन समाज का प्रमुख केंद्र माना जाता है। 
  • यहां के जैन मंदिरों में तीर्थंकर श्री मल्लिनाथ जी का 9 चौकिया मंदिर बहुत ही प्राचीन है, इसका निर्माण संवत 803 में करवाया गया था। 
  • इस जैन मंदिर में विराजमान मल्लीनाथ की प्रतिमा की एक खास विशेषता है, कि इस पर आगे के निचले हिस्से पर कुछ अंकित होने की बजाय इसकी पीठ पर प्रशस्ति अंकित है। 
  • जैन तीर्थकर शांतिनाथ भगवान का विशाल मंदिर जिसे ऊपर वाला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, यहीं पर स्थित है।

अजमेर जिले के प्रमुख धार्मिक स्थल

  • अजमेर में ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह एक पवित्र और धार्मिक स्थल है। सभी धर्मों के लोगों में ख़्वाजा साहब की बड़ी मान्यता है। 
  • दरगाह में तीन मुख्य दरवाजे़ हैं। मुख्य द्वार, ’निज़ाम दरवाज़ा’ निज़ाम हैदराबाद के नवाब द्वारा बनवाया गया, मुगल सम्राट शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया ’शाहजहाँ दरवाजा’ और बुलन्द सुल्तान महमूद ख़िलजी द्वारा बनवाया गया ’बुलन्द दरवाजा’। 
  • उर्स के दौरान दरगाह पर झंडा चढ़ाने की रस्म के बाद, बड़ी देग (तांबे का बड़ा कढ़ाव) जिसमें 4800 किलो तथा छोटी देग में 2240 किलो खाद्य सामग्री पकाई जाती है। जिसे भक्त लोग प्रसाद के तौर पर बाँटते हैं। 
  • श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर भी इन देगों में भोजन पकवाते व बाँटते हैं। 
  • सर्वाधिक आश्चर्य की बात है कि यहाँ केवल शाकाहारी भोजन ही पकाया जाता है।
  • 19वीं सदी में निर्मित यह जैन मन्दिर, भारत के समृद्ध मंदिरों में से एक है। 
  • इसके मुख्य कक्ष को स्वर्णनगरी का नाम दिया गया है। 
  • इसका प्रवेश द्वार लाल पत्थर से तथा अन्दर संगमरमर की दीवारें बनी हैं। जिन पर काष्ठ आकृतियां तथा शुद्ध स्वर्ण पत्रों से जैन तीर्थंकरों की छवियाँ व चित्र बने हैं। इसकी साज सज्जा बेहद सुन्दर है।
  • जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित, श्री ज्ञानोदय जैन तीर्थ के नाम से पहचान रखने वाला यह जैन मन्दिर, पारम्परिक एवं समकालीन वास्तुकला का उत्तम नमूना है। 
  • इसके आसपास 24 लघु देवालय हैं, जो ’जिनालय’ के नाम से जाने जाते हैं। 
  • दिगम्बर जैन समुदाय के लिए यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है।
  • यह मंदिर अशोक पटनी द्वारा बनाया गया था।
  • सांई बाबा के भक्तों के लिए यह मन्दिर वास्तुकला का नवीनतम नमूना है तथा बहुत लोकप्रिय है। 
  • अजय नगर में लगभग दो एकड़ में फैले, इस मंदिर को अनूठे पारदर्शी सफेद संगमरमर से बनाया गया है, जिसमें प्रकाश प्रतिबिंबित होता है। 
  • सन् 1999 में अजमेर निवासी श्री सुरेश के. लाल ने यह मंदिर बनवाया था।
  • सन् 2005 में जैन सम्प्रदाय / समुदाय द्वारा, जैन आचार्य तुलसी की स्मृति में बनवाया गया ‘प्रज्ञा शिखर’ एक मंदिर है जो कि पूरा का पूरा काले ग्रेनाइट पत्थर से बनाया गया है। 
  • अरावली की पहाड़ियों में प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर यह मंदिर टोडगढ़ में स्थित है। 
  • यह एक एन. जी. ओ.(NGO) द्वारा बनवाया गया तथा इसका उद्घाटन (स्व.) डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम द्वारा किया गया था। 
  • प्रज्ञा शिखर एक शांतिपूर्ण स्थल है।
  • टॉडगढ़ को राजस्‍थान का मि‍नी माउण्‍ट आबू भी कहते हैं,

बांसवाड़ा जिले के प्रमुख धार्मिक स्थल

छींछ
  • बांसवाड़ा जिले में बागीदौरा मार्ग पर छींछ गांव में तालाब के किनारे 12वीं शताब्दी का प्राची ब्रह्मा मंदिर है। 
  • यहाँ कृष्ण पाषाण पर हंस की आकृतिनुमा चतुर्भुज ब्रह्माजी की आदमक़द प्रतिमा, शिल्प की दृष्टि से अद्भुत और विलक्षण है। 
  • ब्रह्माजी के बांयी तरफ भगवान विष्णु की दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है।
  • ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार खण्डित प्रतिमा के स्थान पर वर्तमान प्रतिमा की प्रतिष्ठा वि.सं. 1503 में महारावल जगमालसिंह द्वारा करवाई गई थी। 
  • यहां एक शिलालेख है जिसमें वि.सं. 1952 का उल्लेख है जिसके अनुसार कल्ला के पुत्र देवदत्त ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर में सप्तऋषि की ब्रह्माजी की मूर्ति भी है।
मानगढ़ धाम
  • राजस्थान के जलियांवाला बाग़ के नाम से प्रसिद्ध मानगढ़ धाम बांसवाड़ा से 85 किमी की दूरी पर आनंदपुरी के समीप राजस्थान – गुजरात सीमा की पहाड़ी पर स्थित है। 
  • यह स्थान आदिवासी अंचल में स्वाधीनता आन्दोलन के अग्रज माने जाने वाले महान संत गोविन्द गुरू की कर्मस्थली माना जाता है। 
  • ऐतिहासिक मान्यतानुसार इसी स्थान पर 17 नवम्बर 1913 को गोविन्द गुरू के नेतृत्व में मानगढ़ की पहाड़ी पर सभा के आयोजन के दौरान अंग्रेजी हुकू़मत के खिलाफ स्वतंत्रता की मांग कर रहे, 1500 राष्ट्रभक्त आदिवासियों पर अंग्रेज़ों ने निर्ममता पूर्वक गोलियां चलाकर उनकी नृशंष हत्या कर दी थी। 
  • मानगढ़ धाम पर प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें राजस्थान, गुजरात एवं मध्यप्रदेश से हज़ारों श्रृद्धालु आते हैं। 
  • वर्तमान में इसे राष्ट्रीय शहीद स्मारक के रूप में विकसित किया जा रहा है। 
  • गुजरात सरकार एवं राजस्थान सरकार द्वारा इसके विकास के कार्य किए जा रहे हैं।
अन्देश्वर पार्श्वनाथजी जी
  • बांसवाड़ा से 40 कि.मी. की दूरी पर दिगम्बर जैन अतिशय तीर्थ अंदेश्वर पार्श्वनाथजी सभी धर्मों के आस्था का केन्द्र है। 
  • मुख्य मंदिर में जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथजी की पद्मासनस्थ कृष्णवर्णा पाषाण प्रतिमा है। 
  • गर्भगृह और दीवारों पर भगवान पार्श्वनाथजी के दस भव और जैन तीर्थांकरों को अत्यंत सुंदर कांच में चित्रित किया गया है। 
  • पहाड़ी पर शिव मंदिर उत्तर में दक्षिणाभिमुख हनुमान मंदिर व पार्श्व में पीर दरगाह भी है जो सभी धर्मावलम्बियों का केन्द्र है।
अब्दुल्ला पीर
  • यह बोहरा मुस्लिम संत अब्दुल रसूल की लोकप्रिय मज़ार है। 
  • शहर के दक्षिणी भाग में स्थित इस दरगाह को अब्दुल्ला पीर के नाम से जाना जाता है। 
  • हर वर्ष बड़ी संख्या में विशेषतः बोहरा समुदाय के लोग दरगाह के उर्स में शामिल होने आते हैं।
त्रिपुरा सुन्दरी
  • बांसवाड़ा – डूंगरपुर मार्ग पर 19 किमी दूरी पर तलवाडा ग्राम के समीप उमराई गांव में स्थित माँ त्रिपुरा सुन्दरी का प्राचीन मन्दिर है। 
  • मंदिर के उत्तरी भाग में सम्राट कनिष्क के समय का एक शिवलिंग होने से कहा जाता है कि यह स्थान कनिष्क के पूर्वकाल से ही प्रतिष्ठित है। 
  • काले पाषाण की सिंह पर सवार 18 भुजाओं वाली दिव्य आयुष विशाल प्रतिमा है, जो शक्ति पीठ के रूप में जानी जाती है। 
  • स्थानीय लोग इसे ‘तरतई माता, त्रिपुरा महालक्ष्मी’ के नाम से पुकारते हैं। 
  • मंदिर के समीप शिलालेख विक्रम संवत 1540 का लगा हुआ है। 
  • चैत्र एवं अश्विन नवरात्रि में हजारों की संख्या में श्रृद्धालु अपनी मनोकामना हेतु यहां आते हैं। 
तलवाड़ा मंदिर
  • शिल्प नगर तलवाड़ा में त्रिपुरा सुन्दरी मार्ग पर स्थित सिद्धि विनायक मंदिर आस्था का प्रमुख केन्द्र है। 
  • इसे ‘आमलीया गणेश’ के नाम से जाना जाता है। 
  • बुधवार एवं सकंट चतुर्थी को श्रृद्धालु आते हैं। 
  • यहाँ सूर्य मंदिर, महालक्ष्मी मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, राम मंदिर प्रमुख है। 
  • यहां सोमपुरा शिल्पकारों की पत्थरों पर उत्कीर्ण कला की देश विदेश में ख्याति है। 
  • पर्यटन विभाग द्वारा ग्रामीण पर्यटन के अन्तर्गत इस स्थान का चयन किया गया तथा इसमें विकास के कार्य किये गये।

बारां जिले के प्रमुख धार्मिक स्थल

  • सीता माता और लक्ष्मण को समर्पित यह मन्दिर, बारां से 45 कि.मी. दूर है तथा ऐसी मान्यता है कि भगवान राम और सीता के दोनों पुत्र लव और कुश का जन्म यहीं पर हुआ था। 
  • इसमें कई कुण्ड भी हैं जैसे-वाल्मीकि कुण्ड, सीता कुण्ड, लक्ष्मण कुण्ड, सूर्य कुण्ड आदि। 
  • प्रसिद्ध ‘सीताबाड़ी मेला’ भी यहीं आयोजित किया जाता है। 
  • यह एक पिकनिक स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है।
  • यहाँ 8वीं सदी के वैष्णव देवताओं और भगवान शिव के मन्दिरों का समूह है। 
  • बारां से 85 कि.मी. की दूरी पर स्थित काकूनी, परवन नदी के तट पर स्थित है तथा यहाँ राजा भीम देव द्वारा निर्मित ‘भीमगढ़’ किले के अवशेष भी दर्शनीय हैं। 
  • काकूनी मंदिरों से कई मूर्तियाँ कोटा और झालावाड़ के संग्रहालयों में लाकर सुरक्षित रखी गई हैं।
  • शहर से 40 कि.मी. दूरी पर भगवान शिव को समर्पित यह मन्दिर 10वीं शताब्दी का प्राचीन मन्दिर माना जाता है। 
  • इसकी वास्तुकला की शैली खजुराहो शैली से मिलती जुलती है, इसी लिए इसे राजस्थान का ‘मिनी खजुराहो’ भी कहा जाता है। 
  • एक छोटे तालाब के किनारे बसा यह मन्दिर अन्य मन्दिरों से अनूठा है। 
  • यहाँ प्रसाद के तौर पर, एक देवता को मिठाई व सूखे फल चढ़ाए जाते हैं तो दूसरे आराध्य की सेवा में मांस मदिरा प्रस्तुत किया जाता है।
  • यह मस्ज़िद बारां से करीब 80 कि.मी. की दूरी पर है, जो अपने वास्तुशिल्प के लिए प्रसिद्ध है। 
  • इसका प्रारूप दिल्ली की जामा मस्ज़िद को देखकर बनाया गया तथा यह अपने सुन्दर मेहराबों व स्तम्भों के कारण, बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करती है।
  • ब्राह्मण समुदाय के लोग इसे माता का मन्दिर कहते हैं तथा बड़ी श्रृद्धा से शीश नवाते हैं। 
  • बारां से 20 कि.मी. दूर यह मन्दिर सोरसन गांव में है तथा यहाँ शिवरात्रि के अवसर पर प्रतिवर्ष एक मेला आयोजित किया जाता है। 
  • इसमें बड़ी तादाद में भक्त लोग आते हैं। इस मंदिर में एक दीपक की ’अखण्ड ज्योत’ निरन्तर जलती देखी जा सकती है। 
  • ऐसी मान्यता है कि यह ज्योत पिछले 400 वर्षों से लगातार जल रही है।

बाड़मेर जिले के प्रमुख धार्मिक स्थल 

  • बाड़मेर शहर के पश्चिमी भाग में एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित, यह जैन मन्दिर 16वीं शताब्दी में ‘श्री निमाजी जीवाजी बोहरा’ द्वारा बनवाया गया था। 
  • इस मन्दिर में बहुत ही शानदार मूर्तियाँ हैं तथा इसे सुन्दर चित्रों से सजाया गया है। 
  • मन्दिर के अन्दर काँच की बनी, अद्भुत व अनोखी जड़ाई का काम किया गया है।

भरतपुर जिले के प्रमुख धार्मिक स्थल 

  • भगवान राम के भाई लक्ष्मण को समर्पित इस मंदिर में राजस्थानी स्थापत्य शैली और गुलाबी रंग के पत्थरों पर अत्यन्त अनुपम नक़्काशी का काम किया गया है। 
  • दीवारों, छतों , मेहराबों व खंभों पर फूल पत्ते व पक्षियों के चित्र उकेरे गए हैं।
  • एक तरफ उत्तर प्रदेश व दूसरी तरफ हरियाणा के बॉर्डर पर यह छोटा क़स्बा ’कामां’, बृज क्षेत्र का एक हिस्सा है। 
  • भगवान कृष्ण के दादाजी कामसेन ने इसका नाम ‘कामावन’ रखा। 
  • भाद्रपद (जुलाई अगस्त) के माह में यहाँ वैष्णव सम्प्रदाय के लोग वनयात्रा हेतु आते हैं। 
  • बारिश के मौसम में यहाँ ‘परिक्रमा मेला’ लगता है। 
  • यहाँ गोविन्द देव जी, कामेश्वर महादेव शिव मंदिर, ‘विमल’ कुण्ड और चौरासी खम्भा मंदिर हैं।
  • भरतपुर का लोकप्रिय मंदिर, राजपूत, मुगल तथा द्रविड़ स्थापत्य शैली का सुन्दर मिश्रण है। 
  • यह मंदिर महाराजा बलवंत सिंह द्वारा 1845 में बनाना शुरू किया गया था, जिसका निर्माण कार्य करीब 9 दशक या 90 वर्षों तक चला। 
  • उनके उत्तराधिकारी राजा बृजेन्द्र सिंह ने इस मंदिर में देवी गंगा नदी की मूर्ति की स्थापना की थी। 
  • ऐसी मान्यता है कि इसके निर्माण के लिए, राज्य के सभी कर्मचारियों तथा समृद्ध लोगों ने एक माह का वेतन दान किया था। 
  • यहाँ मुख्य आकर्षण भगवान कृष्ण, लक्ष्मीनारायण और शिव पार्वती की मूर्तियाँ हैं। 
  • गंगा सप्तमी और गंगा दशहरा के अवसर पर यहाँ बड़ी संख्या में लोग आते हैं।

बीकानेर जिले के प्रमुख धार्मिक स्थल 

  • बीकानेर जिले में, नोखा के पास, देशनोक नामक एक छोटा सा शहर है जो बीकानेर शहर से लगभग 32 किमी की दूरी पर स्थित है। 
  • यह स्थान करणी माता का तीर्थस्थल है, जो 14वीं शताब्दी में यहां रहती थी और सभी समुदायों के गरीबों के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। 
  • इस क्षेत्र में देशनोक मंदिर स्थित है। देशनोक मंदिर को करणी माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
  • दुनियां भर में चूहों के लिए अपनी पहचान बनाने वाला मंदिर, बीकानेर से 30 कि.मी. की दूरी पर, देशनोक गाँव में है। 
  • यह पर्यटकों में ‘टैम्पल ऑफ़ रैट्स’ के नाम से मश्हूर है। 
  • यहाँ लगभग 25,000 काले चूहे हैं, जिन्हें ‘कबा’ कहते हैं। इनकी पवित्रता इस बात से उजागर होती है कि यदि किसी के पाँव से कोई चूहा दब कर मर जाए तो उसे चाँदी का चूहा बनवा कर, करणी माता के चरणों में चढ़ाना पड़ता है। 
  • एक किंवदंती के अनुसार करणी माता के सौतेले बेटे लक्ष्मण की एक तालाब में डूबने से मृत्यु हो गई। करणी माता ने यमराज से उन्हें जीवित करने के लिए प्रार्थना की। यमराज ने मना कर दिया फिर इस शर्त पर मान गए कि उस दिन के बाद से लक्ष्मण तथा करणी माता के सभी वंशज , चूहे के रूप में जिन्दा रहेंगे। 
  • हजारों चूहों को पवित्र मानकर, मन्दिर में भक्त लोग लड्डू व दूध की बड़ी परातें चढ़ाते हैं, जिन्हें चूहे खाते व पीते हैं। 
  • चूहों का खाया हुआ प्रसाद बड़ा सत्कार माना जाता है। 
  • गर्भगृह में करणी माता की मूर्ति स्थापित है। करणी माता मंदिर का द्वार सफेद संगमरमर से बनी एक सुन्दर संरचना है। 
  • दूर-दूर से पर्यटक इस मन्दिर को देखने आते है। नए दूल्हा-दुल्हन यहाँ माता का आशीर्वाद लेने आते हैं।
  • जैन धर्म के 5वें तीर्थंकर सुमतिनाथ जी को समर्पित यह मन्दिर 15वीं शताब्दी में बनाया गया था। 
  • इसमें काँच का सुन्दर जड़ाऊ काम, भित्ति चित्र तथा सोने के पत्रों से बने चित्र दर्शनीय है। 
  • देश के सभी भागों से यहाँ भक्तगण दर्शनार्थ आते हैं।
  • राव बीकाजी द्वारा इस मंदिर की स्थापना की गई थी। 
  • जोधपुर से आने के तीन वर्ष बाद ही राव बीकाजी ने, कोडमदेसर भैंरू जी की स्थापना यहाँ पर की तथा पूजा अर्चना की। 
  • प्रारम्भ में यह स्थान बीकानेर की नींव रखने के लिए चुना गया था, लेकिन बाद में विचार बदल दिया गया।
  • इस मंदिर में काले संगमरमर की बनी, चौमुखी शिव भगवान की प्रतिमा तथा शिवलिंगम के सामने कांस्य की नंदी प्रतिमा स्थापित है। मंदिर में पानी के दो बड़े जलाशय भी हैं, जिन्हें बावड़ी के रूप में जाना जाता है। 
  • बीकानेर से 6 कि.मी. दूर, ऊँची दीवारों के बीच, यह शिव मंदिर है, जिसे शिवबाड़ी नाम से जाना जाता है। 
  • 19वीं शताब्दी में महाराजा डूंगरसिंह ने अपने पिता महाराजा लाल सिंह के सम्मान में, इस मंदिर का निर्माण कराया था।
  • शाही घराने का शमशान है यह देवीकुण्ड। इसमें उत्कृष्ट छतरियाँ हैं। 
  • प्रत्येक छतरी को बीकाजी वंश के एक शासक को समर्पित किया गया है। 
  • यह मण्डप उस स्थान पर स्थित है जहाँ उनका अन्तिम संस्कार किया गया था। महाराजा सूरत सिंह की छतरी उस युग की वास्तुकला का एक उत्तम नमूना है। 
  • देवी कुण्ड में महाराजा गज सिंह जी से पहले शाही परिवार की 22 महिला सदस्यों के स्मारक हैं, जिन्होंने सती के रूप में अपना बलिदान देकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 
  • राज्य की एक मात्र सता (पुरूष सती) की भी एक छतरी यहाँ है। 
  • महाराजा सूरत सिंह की छतरी पूरी तरह सफेद संगमरमर से बनी तथा राजपूत पेंटिग्स से चित्रित की गई है।
  • बीकानेर से 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह कोलायत का मंदिर परिसर और हिंदुओं के लिए एक पवित्र तीर्थ स्थान है।
  • कोलायत एक पवित्र झील है, जो बीकानेर से करीब 50 कि.मी. दूरी पर है। 
  • यहाँ का इतिहास सांख्य योग के प्रणेता कपिल मुनि की कहानी सुनाता है, जो इस जगह के शांतिपूर्ण वातावरण से इतने अभिभूत हो गए थे कि उन्होंने अपनी उत्तर पश्चिम की यात्रा को बीच में रोक दिया और संसार के चक्र से मुक्ति पाने के लिए, यहीं तपस्या करने लगे। 
  • विशेष रूप से कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर) के दिन झील के पवित्र जल में डुबकी लगाना बहुत शुभ माना जाता है।  

बूंदी जिले के प्रमुख धार्मिक स्थल 

  • विपरीत पिरामिड आकार में बना, धाभाई कुण्ड को जेल कुण्ड भी कहा जाता है। 
  • इसमें बनी कलात्मक, उत्कीर्णनयुक्त सीढ़ियाँ इसका मुख्य आकर्षण हैं।

चित्तौड़गढ़ जिले के प्रमुख धार्मिक स्थल 

  • राणा कुंभा के शासन के दौरान इस मंदिर का निर्माण किया गया था। 
  • उस समय की लोकप्रिय इंडो – आर्यन शैली में बने इस मंदिर का अटूट सम्बन्ध, राजकुमार भोजराज की पत्नी कवियित्री ‘मीरां बाई’ से रहा है। 
  • मीरां बाई को, भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त और संगिनी के रूप में सारा जग जानता है।
  • इस मंदिर का स्वरूप उत्तर भारतीय शैली में मीरां बाई के पूजा स्थल के रूप में किया गया था। 
  • इसकी विविधता, इसकी कोणीय छत है, जिसे दूर से ही देखा जा सकता है। 
  • यह मंदिर चार छोटे मंडपों से घिरा है और एक खुले आंगन में बनाया गया है।

धौलपुर जिले के प्रमुख धार्मिक स्थल 

  • मुचुकुंद के पास, यह गुरूद्वारा, सिख गुरू हरगोविन्द साहिब की धौलपुर यात्रा के कारण, स्थापित किया गया था। 
  • शेर शिखर गुरूद्वारा, सिखधर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है तथा ऐतिहासिक महत्व व श्रृद्धा का स्थान रखता है। 
  • देश भर से सिख समुदाय के लोग यहाँ पर शीश झुकाने आते हैं।
  • सबसे पुराने शिव मंदिरों में से एक, चोपरा शिव मंदिर, 19वीं सदी में बनाया गया था। 
  • प्रत्येक सोमवार को यहाँ भक्तों की भीड़ नजर आती है, क्योंकि सोमवार का दिन भगवान शिव का माना जाता है। 
  • इसकी स्थापत्य कला अनूठी है। मार्च के महीने में महा शिवरात्रि के अवसर पर, तीर्थयात्री दूर दूर से आते हैं तथा मेले में भाग लेते हैं।

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